नुक़्ते के प्रयोग से देवनागरी लिपि और ज़्यादा सक्षम और सम्पन्न होगी।
जब हम ड़ और ढ़ के नीचे नुक़्ते लगाकर उनका सही उच्चारण करते हैं तो क़, ख़, ग़, ज़ और फ़ का क्यों ना करें।
ध्वनि के स्तर पर हिन्दी के आगत वर्णोँ (क़,ख़,ग़,ज़,फ़,और.व)के प्रयोग मेँ नुक्ते का प्रयोग वाँछनीय तो हैँ लेकिन आसान नहीँ। हिन्दी की विविध शैलियोँ तथा अन्तःबोलियोँ की उच्चारणगत भिन्नता एवं जटिलता को ध्यान में रखते हुये भाषा-शास्त्र के आधार पर इसका सहज मानकीकरण दुस्साद्य हैँ।
मैं बिल्कुल इस्तेमाल करता हूँ. मसला सीधा है. भाषा नैसर्गिक चीज़ नहीं है, ये बदलती रहती है. थोड़ी देर के लिए उर्दू को बहस से बाहर रखकर सिर्फ़ अंग्रेज़ी शब्दों के सही लिप्यंतर पर सोचें तो हमें लगेगा कि बिन्दी लगाना ज़रूरी है. कोशिश तो यही होनी चाहिए कि हर ज़बान जितनी सही बोली और लिकी जा सके, उतनी बोली-लिखी जाए. राजनीतिक सवाल अहम हैं, पर वे वक़्त के साथ बदलते रहते हैं, हमें अपने समय में राजनीति से उठकर अच्छी भाषा बरतनी चाहिए, बस. राजनीति की हदें सीमित होती हैं, लेकिन भाषा हदों को नहीं मानती.
रविकान्त
Vaike - 16 years ago
(jab ham nukte ka istemaal karte hain)
Vaike - 16 years ago
Main ek videshi hoon. Is tarah hindi seekhna bahut zyada aasaan hai - vyaakaran aasaan ban jaata hai.
alkadunputh - 16 years ago
mein bhasha kee manakta mein vishvas rakhti hoi
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नुक़्ते के प्रयोग से देवनागरी लिपि और ज़्यादा सक्षम और सम्पन्न होगी।
जब हम ड़ और ढ़ के नीचे नुक़्ते लगाकर उनका सही उच्चारण करते हैं तो क़, ख़, ग़, ज़ और फ़ का क्यों ना करें।
ध्वनि के स्तर पर हिन्दी के आगत वर्णोँ (क़,ख़,ग़,ज़,फ़,और.व)के प्रयोग मेँ नुक्ते का प्रयोग वाँछनीय तो हैँ लेकिन आसान नहीँ। हिन्दी की विविध शैलियोँ तथा अन्तःबोलियोँ की उच्चारणगत भिन्नता एवं जटिलता को ध्यान में रखते हुये भाषा-शास्त्र के आधार पर इसका सहज मानकीकरण दुस्साद्य हैँ।
मैं बिल्कुल इस्तेमाल करता हूँ. मसला सीधा है. भाषा नैसर्गिक चीज़ नहीं है, ये बदलती रहती है. थोड़ी देर के लिए उर्दू को बहस से बाहर रखकर सिर्फ़ अंग्रेज़ी शब्दों के सही लिप्यंतर पर सोचें तो हमें लगेगा कि बिन्दी लगाना ज़रूरी है. कोशिश तो यही होनी चाहिए कि हर ज़बान जितनी सही बोली और लिकी जा सके, उतनी बोली-लिखी जाए. राजनीतिक सवाल अहम हैं, पर वे वक़्त के साथ बदलते रहते हैं, हमें अपने समय में राजनीति से उठकर अच्छी भाषा बरतनी चाहिए, बस. राजनीति की हदें सीमित होती हैं, लेकिन भाषा हदों को नहीं मानती.
रविकान्त
(jab ham nukte ka istemaal karte hain)
Main ek videshi hoon. Is tarah hindi seekhna bahut zyada aasaan hai - vyaakaran aasaan ban jaata hai.
mein bhasha kee manakta mein vishvas rakhti hoi